वीर बालक बादल | अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती की कहानी

वीर बालक बादल | अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती की कहानी

Vir balak badal


वीर बालक बादल उस समय दिल्ली की गद्दी पर अलाउद्दीन खिलजी बादशाह होकर बैठा था यह बहुत-बहुत तथा निष्ठुर बादशाह का राजपूताने में चित्तौड़ के सिंहासन पर उस समय राणा रतन सिंह विराजमान अलाउद्दीन ने सुना कि राणा की महारानी पद्मिनी बहुत ही सुंदर है वह पद्मिनी को किसी भी प्रकार पाने के लिए बड़ी भारी सिंगर लेकर राजपूताने गया और चित्तौड़ से थोड़ी दूर पर उसने अपनी सेना का पड़ाव डाला उसने राणा के पास संदेश भेजा मैं पद्मिनी का प्रतिबिंब शीशे में देखकर लौट जाऊंगा महाराणा रतन सिंह ने इतनी बात के लिए व्यर्थ बात बढ़ाना अच्छा नहीं समझा

रानी पदमावती कोन थी

 उनके बुलाने पर अलाउद्दीन को दुर्ग में दर्पण में रानी पद्मिनी का प्रतिबंध दिखा दिया गया लौटते समय राणा उसे दुर्ग से बाहर तक पहुंचाने आया पहले से बाहर अलाउद्दीन ने पहले से अपने सैनिक छिपा रखे थे उन्हें पकड़ लिया और बंदी बनाकर रख लिया राणा के बंद हो जाने से चित्तौड़ मुसीबत में आ गया 

Rani pdmawati


रानी पद्मिनी के मामा ने एक योजना बनाई अलाउद्दीन को संदेश भेजा गया रानी रानी बाग के पास आने को तैयार है उनके आने पर बादशाह राणा को छोड़ दे रानी के साथ दासी आएंगी उन्हें रोके नहीं इस बात को स्वीकार कर लिया अंधकार होने पर योजना बना रहे थे आप क्या सोचते हैं के पास आई थी वह रानी थी नही वहां आया था वीर बालक बादल बैठे थे उठाने वाले में भी राजपूत योद्धा 

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को मुक्त कर के घोड़े पर बैठा कर रहे थे महाराणा रतन सिंह ने इतनी बात के लिए व्यर्थ रक्त बात करना अच्छा नहीं समझा उनके बुलाने पर अलाउद्दीन दुर्ग में आया दर्पण में रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब उसे दिखा दिया गया लौटते समय राणा उसे दुर्ग से बाहर तक पहुंचाने आए दुर्ग से बाहर अलाउद्दीन ने पहले से अपने सैनिक छिपा रखे थे उन्होंने राणा पर आक्रमण करके उन्हें पकड़ लिया और बंदी बनाकर वह अपने शिविर में ले गए राणा के बंदी हो जाने से चित्तौड़ के दुर्ग में आकार मच गया बादशाह की सेना कितनी बड़ी थी बादशाह की सेना इतनी बड़ी थी कि उसे सीधे संग्राम करके विजय पाने की कोई आशा नहीं थी अंत में रानी पद्मिनी के मामा घोड़ा ने एक योजना बनाई

रानी पद्मिनी कँहा की रानी थी

 अलाउद्दीन को संदेश भेजा गया रानी पद्मिनी बादशाह के पास आने को तैयार है यदि उनके आ जाने बादशाह की सेना इतनी बड़ी थी कि उसे सीधे संग्राम करके विजय पाने की कोई आशा नहीं थी अंत में रानी पद्मिनी के मामा घोड़ा ने एक योजना बनाई अलाउद्दीन को संदेश भेजा गया रानी पद्मिनी बादशाह के पास आने को तैयार है यदि उनके आ जाने पर बादशाह राणा को छोड़ दें रानी के साथ-साथ सदस्य भी आएंगी सही सैनिक उन्हें रोके नहीं पादशाह ने इस बात को बड़े उत्साह से स्वीकार कर लिया साईं काल अंधकार होने पर दुर्ग से 700 पालकी या निकली बादशाह के सैनिक विजय के उन्माद में उत्सव मना रहे थे शाही सेना में पहुंचकर रानी ने पहले राणा से भेंट करनी चाहिए और यह मांग भी स्वीकार हो गई आप क्या सोचते हैं कि रानी पदमनी पालकी में बैठकर यवन बादशाह के पास आई थी पालक की में रानी पालकी पालकी में बैठ रानी बना स्त्री वेश में छिपा अपने अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित रानी का 12 वर्ष का सुंदर भांजा बालक बादल वहां आया था दूसरी पार्टियों में भी राजपूत सरदार बैठे थे और पालकी उठाने वाले कहारों के भेष में भी राजपूत योद्धा ही थे राणा को मुक्त कर के घोड़े पर बैठा कर कुछ सैनिकों के साथ दुर्ग की ओर उन्होंने भेज दिया और स्वयं अलाउद्दीन की सेना पर शस्त्र लेकर टूट पड़े गोरा इस सेना का सेनापति तो कर रहे थे बादल ने इस युद्ध में अद्भुत वीरतादिखलाई लेकिन मुट्ठी भर राजपूत समुद्र के समान विशाल शाही सेना से कब तक लड़ते गोरा रणभूमि में काम आए दोनों हाथों से तलवार चला कर जवन सैनिकों को गाजर मूली की भांति काटता हुआ बालक बादल दुर्ग में पहुंच गया 

Vir balak badal


अलाउद्दीन चाहता था कि इस युद्ध का समाचार दुर्ग में ना पहुंचे अचानक आक्रमण करके वह पद्मनी को पकड़कर दिल्ली ले जाना चाहता था किंतु उस 12 वर्ष के बालक ने उसकी एक भी चाल चलने नहीं दी दुर्ग में समाचार पहुंचते ही राजपूत वीरों ने केसरिया बाना पहना और निकल पड़े धर्म एवं मातृभूमि पर मस्तक चढ़ाने बड़ी कठिनाई से अलाउद्दीन को विजय प्राप्त हुई अपनी अधिकांश सेना की बलि देकर जब वह चित्तौड़ के पवित्र दुर्ग में घुसा तब वहां बहुत बड़ी बाधाएं करके चल रही थी

Rani padamawati

 राजपूताने की देवियां पापी पुरुष के स्पर्श से बचने के लिए अग्नि में प्रवेश करके स्वर्ग पहुंच चुकी थी अलाउद्दीन ने अपना सिर पीट लिया भारत की युवा गौरवमई दिव्य भूमि शक्तियों के तेज के साथ वीर वीर बालक बादल की सूत एवं बलिदान से नित्य उज्जवल है


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